आम के बोराते ही हर साल की तरह कोयल फिर आ गई,अपनी मधुर मधुर आवाज में,कुहू कुहू गाती हुई आम की इस टहनी से उस टहनी पर फुदक -फुदक जाती
अपनी गर्दन को इधर उधर धुमाती जाती अपनी ही धुन में मगन गाती जाती .................धीरे -धीरे उसकी आवाज की तीब्रता बढती जाती .......तेज और तेज
ये उसकी रोज की दिनचर्या में शामिल हो गया था .कभी -कभी तो तुम इतनी तेज आवाज में कुहू कुहू करती हो मानो झगडा कर रही हो ....कभी लगता मानो
सबका ध्यान अपनी ओर खीचना चाहती हो ...........मैं समझ सकती हूँ कोयल प्यारी तुम्हारे इस बिद्रोह को .............
सूर्य की किरने फूटते ही नन्हे नन्हे बच्चे अलसाये से उठ जाते और स्कूल जाने की आपा -धापी में खोये ....हडबडाये रहते........ युनिफोर्म ,टिफिन स्कूल-बैग और
समय पर आती स्कूल वैन में उलझे बच्चे ये भी नहीं समझ पाते की ये वही कोयल है जो उनकी पाठ्य -पुस्तक में पठाई जाती है .......
तुम बोलती जाती हो ...तेज......और तेज .....और बच्चे हैं की तैयार हो कर स्कूल वैन की तरफ भागते जाते ..........
बेचारी कोयल बोलती जाती ........बोलती जाती ......मानो कह रही हो ..मुझे सुनो मैं कोयल हूँ .............
कुहू-कुहू करती इस पेड़ से उस पेड़ पर उडती जाती ...और अलसाया पड़ा हर घर, हर व्यक्ति शहर की इस आपा-धापी में भागने को तैयार होने लगता
दूर पेड़ पर बैठी कोयल उदास सी मायूस सी कुहू-कुहू करती जाती ................
अपनी गर्दन को इधर उधर धुमाती जाती अपनी ही धुन में मगन गाती जाती .................धीरे -धीरे उसकी आवाज की तीब्रता बढती जाती .......तेज और तेज
ये उसकी रोज की दिनचर्या में शामिल हो गया था .कभी -कभी तो तुम इतनी तेज आवाज में कुहू कुहू करती हो मानो झगडा कर रही हो ....कभी लगता मानो
सबका ध्यान अपनी ओर खीचना चाहती हो ...........मैं समझ सकती हूँ कोयल प्यारी तुम्हारे इस बिद्रोह को .............
सूर्य की किरने फूटते ही नन्हे नन्हे बच्चे अलसाये से उठ जाते और स्कूल जाने की आपा -धापी में खोये ....हडबडाये रहते........ युनिफोर्म ,टिफिन स्कूल-बैग और
समय पर आती स्कूल वैन में उलझे बच्चे ये भी नहीं समझ पाते की ये वही कोयल है जो उनकी पाठ्य -पुस्तक में पठाई जाती है .......
तुम बोलती जाती हो ...तेज......और तेज .....और बच्चे हैं की तैयार हो कर स्कूल वैन की तरफ भागते जाते ..........
बेचारी कोयल बोलती जाती ........बोलती जाती ......मानो कह रही हो ..मुझे सुनो मैं कोयल हूँ .............
कुहू-कुहू करती इस पेड़ से उस पेड़ पर उडती जाती ...और अलसाया पड़ा हर घर, हर व्यक्ति शहर की इस आपा-धापी में भागने को तैयार होने लगता
दूर पेड़ पर बैठी कोयल उदास सी मायूस सी कुहू-कुहू करती जाती ................
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